गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

है दम तो इस महामूर्खराज पर कटु टिप्पणी कर के दिखा...........

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वैसे आज सोच रहा था की मैं आज अपने पाठकों का दिल से आदर करूँ । जो अग्रज हैं उन्हें इस महामूर्खराज का सादर चरणस्पर्श। जो बराबर वाले है उन्हें नमस्कार और छोटों को स्नेह।

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अब आप बोलेंगे भई महामूर्खराज भला ये क्या बात हुई शीर्षक शेर के समान गर्जना और पोस्ट भीगी बिल्ली सी म्याऊँ म्याऊँ !  भई डर गए क्या।

महामूर्खराज उवाचः - भैया मेरे, मैं न तो किसी को डराता हूँ ना ही किसी से डरता हूँ हाँ ये और बात है की  इसमे ईश्वर अपवाद है क्योकि बस उनसे ही डरता हूँ। मैंने तो मात्र शब्दो का जाल बुन कर बिछाया है की जिसमे फंस कर आप यहाँ तशरीफ़ लाये और इस महामूर्खराज की विनती सुने

हाँ तो मुद्दे की बात यह है की मैं आप लोगों की प्रशंसा भरी, आवेदन भरी और हौसला अफजाई वाली टिप्पणिया पढ़ पढ़ कर काफी बोर हो चुका हूँ

अमा यार कैसी कैसी टिप्पणिया करते हो खुद ही पढ़ लो कुछ नीचे लिख दी है

"अब तूफान लाईये",  "वाह..... बढ़िया" , "nice", “रचना की तारीफ करनी होगी।”,  “बाबा महामूर्खराज की जय हो ! जय हो !”, “हमें तो "दर्शन" पढ़ने का चाव है इस विषय में भी कुछ कहियेगा तो अच्छा लगेगा”। "जय हो आपकी उत्पत्ति कब हो गई गुरुदेव"। "जय हो बाबा जी की! वैसे आजकल बाबाओं की ग्रहदशा कुछ ठीक नहीं चल रही :-)"

कुछ लोग तो कहते है "चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें"। पर भैया मेरे! पोस्ट के साथ साथ टिप्पणियों की सार्थकता बनाए रखेगे ये लिखने के लिए शब्द कम और इसके अनुसरण के लिए क्या समय कम पड़ गया था। क्या यह हमारी आपकी जिम्मेदारी नहीं है।

मैं तो ब्लोगजगत और लेखनकला दोनों मे ही नया हूँ या यूँ समझये की एक नवजात शिशु की भाँति अबोध हूँ। जब इस ब्लॉग जगत मे प्रवेश किया तो उम्मीद नहीं की थी की मेरी पहली पोस्ट को 17 टिप्पणियाँ मिलेंगी और लोग बाहें फैला कर मेरा स्वागत करेंगे साथ ही कोई मेरा अनुसरणकर्ता भी बनेगा, आपसबों के इस प्रेम के आगे सदैव नतमस्तक रहूँगा।

बस एक विनती है की दिल खोल कर मेरी निंदा कीजिये क्योंकि आज तक सिर्फ पठन मे ही साहित्य से मेरा रिश्ता रहा है लेखनकला की शैलियों और उनके साहित्यिक नियमो से सर्वथा अनभिज्ञ हूँ अतः उन्हें सीखना चाहता हूँ अध्यन तो कर रहा हूँ पर प्रायोगिक दृष्टिकोण से आपकी सीख भरी निंदा  अधिक कारगर होगी।

निंदा कटु हो पर सयंमित शब्दों से सजी हो तो भी मुझे पसंद आएगी और यदि असंयमित शब्दो से भी सजी होंगी तो भी  ग्रहण करने योग्य भाव को अपना लूँगा। शेष भाव को बिना कुछ कहे बिना कुछ लिखे मेरे शब्दो द्वारा आपके हृदय को पहुँचाई गई चोट मान कर आप से क्षमा माँग लूँगा यदि आप दंड देना चाहें तो आपका हर दंड  बिना किसी किन्तु परंतु के स्वीकार्य होगा। बस यही विनती है मेरी निंदा करते रहे करते रहे और मुझे प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का अवसर प्राप्त होता रहे।

यह मात्र एक विनती नहीं वरन जीवनदर्शन का सार भी है।

भई अब इससे बड़ा तूफान लाना मेरे बस मे नहीं है।

दम है तो इस महामूर्खराज पर कटु टिप्पणी कर के दिखाओ  ...................

ॐ शांति। पर .....................................  आप समझ तो गए ही होंगे।

 जय हो! जय हो!

13 टिप्‍पणियां:

  1. Mahaa....Raaj ji,
    Nindaa paanaa aasaan nahin. nindaa paane ke liye kuchh anokhaa karnaa padtaa hai. anokhaa bhi kuchh anokhaapan liye honaa chaahiye. anokhaapan matlab an-o-khaa-pan. samajh rahe hain naaaaaaaa.

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  2. भैया
    इससे उम्दा सबक और क्या होगा ? १७ टिप्पणियऒं में अधिकांश को आमंत्रण पाती समझिये बाकी सब खैरियत है
    इससे आपका बिंदास होना साबित होता है "निंदा कटु हो पर सयंमित शब्दों से सजी हो तो भी मुझे पसंद आएगी और यदि असंयमित शब्दो से भी सजी होंगी तो भी ग्रहण करने योग्य भाव को अपना लूँगा। "
    देख कर आनंद आ गया ...... मिलते रहूंगा सच साफ़ सुथरी जगह पे आना अच्छा लगा जी

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  3. भूल सुधार => टिप्पणियऒं को टिप्पणीयों बांचा जाए . एक ठौ बात हम कहे देता हूं फ़िर से
    "बेहतरीन" जय बिहार=जय भारत

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  4. “हमें तो "दर्शन" पढ़ने का चाव है इस विषय में भी कुछ कहियेगा तो अच्छा लगेगा”।

    आपने पिछली पोस्ट में जो विषय लिखे थे वुमे ज्यादा रूचि नहीं है और जो पसंद है वो बता दिया इस पर लिखेंगे तो पढ़ने में ज्यादा मजा आएगा
    बाकी जो लिक देंगे पढ लेंगे

    बस लिखते रहें :)

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  5. वीनस केसरी जी मेरा आपका दिल दुखाने का कोई इरादा नहीं और ना ही आप क्या पढ़े या ना पढ़े उसपर मैं अपनी कोई इच्छा आरोपित नहीं कर रहा हूँ मैंने तो बस एक संदर्भ मे “हमें तो "दर्शन" पढ़ने का चाव है इस विषय में भी कुछ कहियेगा तो अच्छा लगेगा”। इस पंक्ति का प्रयोग किया है किसने कहा है क्यों कहा है आदि विषय तो गौण है फिर भी यदि मैंने आपको ठेस पहुँचाई है तो आपसे क्षमा माँगता हूँ वैसे मैंने अपनी पोस्ट महामूर्खराज का दर्शनशास्त्र आपकी इच्छा के कारण ही लिखी थी उसे पढ़िएगा जरूर और अपनी टिपण्णी के द्वारा मार्गदर्शन कीजियेगा एक बार फिर से क्षमा माँगता हूँ धन्यवाद

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  6. अपनी लिखाई को तराशने के लिये प्रतिदिन कुछ समय पढ़ने के लिये निकालें. अच्छा लिखने के लिये अच्छा पढ़ना आवश्यक है.जैसे कृशन चंदर, शरद जोशी, हरिशंकर परसाई आदि
    राग-दरबारी अवश्य पढ़ें. अपने लिखने के कार्य में लगे रहें. जितना लिखेंगे उतना ही निखरेंगे.
    अंत में इन पंक्तियों को याद रखें."बिन मांगे टिप्पणी मिले / मांगे मिले न सीख "

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  7. सब तरह की टिप्पणियाँ आने दिजिये, भले ही इस बात की पावती मान कर कि हमने आपको पढ़ लिया है और उसमें से जो सीख दे जाये, उसे बोनस मान कर आत्मसात कर लें. इसमें इतना विश्लेषण कैसा?

    अगर करना आवश्यक ही हो तो आत्म विश्लेषण करिये और उदाहरण खड़े करिये. लोग अनुसरण करने लगेंगे.

    अनेक शुभकामनाएँ.

    अच्छा पठन करें और अच्छा लेखन करें.

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  8. सिर मे दर्द हो रहा है पर आपने दम ही ऐसा दिया कि आना ही पड़ा आकर बहुत अच्छा लगा ।दोवारा दम न देना नहीं तो अपना तो दम ही निकल जायगा कमजोर ....हूं न। कभी-कभी तो एक भी टिप्पणी खाने को नहीं मिलती ।कभी कोई छोड़ ही जाए तो।इतनी गर्म होती है कि न निगलते बनती है न उगलते ,शायह हमारी हालत देखकर ही किसी ने का है जैसी करनी बैसी भरनी।

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  9. बस एक विनती है की दिल खोल कर मेरी निंदा कीजिये

    @ ऊपर वाली फोटो में मुक्का देख कर निन्दात्मक टिप्पणी करने की हिम्मत भी तो नहीं हो रही :(

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  10. aap ko humaari or se dher saari ninda! swikaar kare(jitni uchit ho)....

    kunwar ji,

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