शनिवार, 17 अप्रैल 2010

पिछले 4 दिन खुशियाँ कम गम ज्यादा

 

पिछले 4 दिनों मे जो हुआ शायद मेरे जीवन के सबसे कठिनतम पलों मे था। अपनी आँखों से टुकुर टुकुर सपनों के उन हवाई महलों को ध्वस्त होते देखता रहा। कई बार पहले भी ऐसा हो चुका है पर फर्क सिर्फ इतना है इस बार जाग रहा था और पहले नींद  मे रहता था।

14 अप्रैल रात के करीब 10 बजे अचानक से तेज हवाएँ चलने लगी साथ मे बिजली भी चमक रही थी। मैं और पिताजी तेजी से गुहाली (गाय को रखने की जगह)  की तरफ भागे कारण वहाँ जल रहा घूरा था। जिसके धुए से मच्छरों को गायों से दूर रखा जाता है कहीं तेज हवाओं की वजह से आग की भयावह लपटो न मे न तब्दील हो जाए। जैसे ही वहाँ पहुँच कर हमने उसे बुझाया तेज़ बारिश भी शुरू हो गयी और साथ मे ओले भी। इस  आँधी और बारिश के कारण तनाव का दौर भी शुरू हो गया।

भई कल ही गेहूँ काटना शुरू किया था जो भी कटा उसे खेत मे ही छोड़ कर आए थे की कटाई जब पूरी हो जाएगी तो एक साथ बोझे बना कर लाना आसान होगा और पिछले कई दिनो से मौसम भी शुष्क ही था इस बिन बुलाई बारिश की तो कोई आशंका ही न थी। 70% फसल तो नष्ट हुई ही साथ मे आम और लीची की फसल भी बर्बाद हो गयी । काम संभालने के बाद जीवन मे पहली बार इतना नुकसान हुआ है। पर अखबारों से दूसरे लोगों की क्षति का जो विवरण मिला तो अब लगता है की मेरी क्षति उनके आगे बहुत तुच्छ है।

झटका तो लगना स्वाभाविक है पर भई किसान हूँ हाथ पर हाथ धर कर तो नहीं बैठ सकता सो मूंग की फसल बोने की तैयारी शुरू कर दी है वैसे भी बिना असफलता के सफलता तो मिलती नहीं। दूसरा गम बिजली मोबाइल और इंटरनेट नेटवर्क के बाधित होने  के कारण उत्पन हुआ। नेटवर्क तो आज ठीक हो गया है पता नहीं बिजली कब आएगी। वो तो भला हो मेरे पड़ोसी का जो उसके जेनरेटर से मोबाइल और लैपटाप चार्ज हो रहा है।

अब और क्या कहूँ बस गम ज्यादा है खुशी कम है पर हौसले बुलंद है। एक न एक दिन खुशियाँ भी ज्यादा होंगी।  

3 टिप्‍पणियां:

  1. हे महामूर्खराज जब हौसले बुलंद हो तो खुशियान भि ज्यादा दूर नही होंगी. सपने टूट्ते ही है नये सपनो को बुनने के लिये

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  2. आपकी फसल की हानि के बारे में सुनकर दुख हुआ। इस समय तक तो प्रायः सब जगह फसल कट जाती है। मूँग की खेती बढ़िया रहे।
    घुघूती बासूती

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